नवचंडी पाठ क्या है, और इसके पीछे की कथा
- Saraswati Seva Parivar
- 1 day ago
- 4 min read
मंदिरों में आपने अक्सर सुना होगा - "इस बार नवचंडी पाठ हो रहा है।" लेकिन नवचंडी पाठ असल में है क्या? यह कहाँ से आया? और इसमें "नव" का मतलब क्या है? यह लेख इन्हीं सवालों के सरल जवाब देता है। इसे पढ़ने के लिए किसी शास्त्र-ज्ञान की जरूरत नहीं है।
नवचंडी पाठ क्या है
नवचंडी पाठ देवी दुर्गा की आराधना की एक विशेष विधि है। इसमें दुर्गा सप्तशती नाम के ग्रंथ का पाठ नौ बार किया जाता है या नौ विद्वान मिलकर इसका पाठ करते हैं। पाठ के साथ देवी के नौ रूपों (नवदुर्गा) की पूजा और हवन भी होता है। इसीलिए इसे "नवचंडी" कहते हैं - नौ बार चंडी (देवी) का पाठ।
दुर्गा सप्तशती में 700 श्लोक हैं, जो 13 अध्यायों में बंटे हैं। "सप्तशती" का अर्थ ही है — सात सौ। इसी ग्रंथ को चंडी पाठ या देवी माहात्म्य भी कहा जाता है।
यह ग्रंथ आया कहाँ से
दुर्गा सप्तशती कोई अलग किताब नहीं है। यह मार्कण्डेय पुराण का एक हिस्सा है - हिंदू धर्म के 18 प्रमुख पुराणों में से एक। मार्कण्डेय ऋषि के नाम पर बने इस पुराण के बीच के अध्यायों में देवी की महिमा की कथा आती है। वही हिस्सा अलग से "दुर्गा सप्तशती" के रूप में पढ़ा जाता है।
यानी जब मंदिर में नवचंडी पाठ होता है, तो असल में पुराणों की हजारों साल पुरानी वाणी दोहराई जा रही होती है।

कथा - एक राजा, एक व्यापारी और एक ऋषि
दुर्गा सप्तशती की पूरी कथा एक सीधी-सरल कहानी के ढांचे में कही गई है।
सुरथ नाम का एक राजा था। शत्रुओं ने उसका राज्य छीन लिया और अपने ही मंत्रियों ने धोखा दिया। दुखी होकर राजा वन में चला गया। वहीं उसकी मुलाकात समाधि नाम के एक वैश्य (व्यापारी) से हुई, जिसे उसके अपने ही परिवार ने धन के लालच में घर से निकाल दिया था।
दोनों के दुख अलग थे, पर सवाल एक था - जिन्होंने हमें ठुकराया, उन्हीं की याद में मन क्यों अटका है? यह मोह क्यों नहीं छूटता?
यह सवाल लेकर दोनों मेधा ऋषि के आश्रम पहुँचे। ऋषि ने उत्तर दिया - यह सब महामाया की शक्ति है। वही देवी पूरे संसार को मोह में बांधती हैं, और वही प्रसन्न होने पर मुक्ति भी देती हैं। फिर ऋषि ने दोनों को देवी की तीन महान कथाएँ सुनाईं। यही तीन कथाएँ दुर्गा सप्तशती के तीन भाग (चरित्र) हैं।
तीन चरित्र - तीन कथाएँ
पहला चरित्र (प्रथम अध्याय):- सृष्टि के आरम्भ में मधु और कैटभ नाम के दो असुर भगवान ब्रह्मा को मारने दौड़े। भगवान विष्णु योगनिद्रा में सोए थे। ब्रह्माजी ने देवी की स्तुति की, देवी ने विष्णु की निद्रा हटाई, और विष्णु ने असुरों का वध किया। इस भाग में देवी महाकाली रूप में हैं।
दूसरा चरित्र (अध्याय 2–4):- महिषासुर नाम के भैंसे के रूप वाले असुर ने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। तब सभी देवताओं के तेज से एक देवी प्रकट हुईं - हर देवता ने अपना अस्त्र दिया। देवी ने महिषासुर का वध किया। इसीलिए देवी को महिषासुरमर्दिनी कहते हैं। इस भाग में देवी महालक्ष्मी रूप में हैं।
तीसरा चरित्र (अध्याय 5–13):- शुम्भ और निशुम्भ नाम के असुरों ने तीनों लोकों पर कब्जा कर लिया। देवी ने पहले उनके दूतों को समझाया, फिर युद्ध में शुम्भ-निशुम्भ समेत चण्ड, मुण्ड और रक्तबीज जैसे असुरों का अंत किया। चण्ड-मुण्ड का वध करने से ही देवी का नाम चामुण्डा पड़ा। इस भाग में देवी महासरस्वती रूप में हैं।
कथा के अंत में राजा सुरथ और समाधि वैश्य ने देवी की उपासना की। देवी प्रकट हुईं - राजा को उसका राज्य वापस मिला, और वैश्य को ज्ञान, जिससे उसका मोह छूट गया। यानी देवी सांसारिक सुख भी देती हैं और मुक्ति भी - जो जो मांगे।

"नव" यानी नौ - किसकी पूजा होती है
नवचंडी में देवी के नौ रूपों की पूजा होती है, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। इनके नाम स्वयं सप्तशती के "देवी कवच" में दिए गए हैं — शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। नवरात्रि के नौ दिनों में भी इन्हीं नौ रूपों की पूजा होती है।

शास्त्रों में कहा गया है कि सप्तशती का एक पाठ भी फलदायी है, लेकिन नौ पाठ का फल कई गुना होता है। इसीलिए विशेष अवसरों पर नवचंडी का आयोजन किया जाता है।
नवचंडी पाठ कब और क्यों किया जाता है
नवचंडी पाठ प्रायः इन अवसरों पर होता है - नवरात्रि (चैत्र और शारदीय), किसी नए कार्य या गृह-प्रवेश के आरम्भ पर, परिवार पर आए संकट या रोग के निवारण के लिए, और सामूहिक कल्याण की कामना से मंदिरों में।
विधि सरल शब्दों में ऐसी है - पहले गणेश पूजा और कलश स्थापना, फिर नवदुर्गा की पूजा, फिर विद्वानों द्वारा सप्तशती के नौ पाठ, और अंत में हवन तथा कन्या पूजन। पूरा आयोजन एक दिन में भी होता है और नौ दिनों में भी।

अंत में
नवचंडी पाठ कोई जटिल कर्मकांड नहीं है। इसके केंद्र में एक सीधी बात है - जो शक्ति पूरे संसार को चला रही है, उसे नमन करना। राजा सुरथ और समाधि वैश्य की कथा हमें यही बताती है कि देवी के द्वार पर हर कोई आ सकता है - राज्य खोया हुआ राजा भी, और घर से निकाला हुआ साधारण व्यक्ति भी।
सरस्वती मंदिर, गम्हरिया में समय-समय पर नवचंडी पाठ, अखंड पाठ एवं अन्य दिव्य धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता रहता है। ऐसे पावन आयोजनों की सूचना प्राप्त करने के लिए हमारे मंदिर परिवार से जुड़े रहें।
॥ जय माँ सरस्वती ॥
---
स्रोत: दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य), मार्कण्डेय पुराण। श्लोक मूल संस्कृत पाठ से लिए गए हैं।




Comments